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सक्ती राजमहल से राजनीति बाहर क्या निकली मानो सक्ती की किस्मत ही रूठ गई , एक-एक कार,,

सक्ती राजमहल से राजनीति बाहर क्या निकली मानो सक्ती की किस्मत ही रूठ गई , एक-एक कार,,
सक्ती 03 दिसम्बर 2024 - 1980 का वो दशक जिसे भी याद होगा वह आज यह जरूर सोचता होगा की वो भी क्या दिन थे जब पूरी राजनीति सिर्फ एक जगह से चलती थी और बिना यँहा की मंजूरी के सक्ती तो सक्ती पूरे अविभाजित मध्यप्रदेश में एक पत्ता भी नही हिलता था और वो दौर था सक्ती के शेर राजा सुरेन्द्र बहादुर सिंह का। रोज शाम सक्ती के राजमहल में चौपाल सजती थी नेता और अधिकारी राजा साहब के आगे हाथ बंधे खड़े उनके हुक्म का इंतजार करते रहते थे। सक्ती के हर छोटे बड़े फैसले राजमहल के इसी चौपाल से होते थे।

उस वक्त कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें राजा साहब के फैसले रास नही आते थे और बेमन राजा साहब के फैसले के आगे सिर झुकाते थे। एक दौर ऐसा भी आया जब लोगो ने महल से राजनीति बाहर निकालने की ठानी और 1998 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के मेघाराम साहू को चुनाव जीता कर विधायक बनाया। 

1998 के इस चुनाव के बाद राजमहल से राजनीति बाहर तो निकली लेकिन अपने साथ सक्ती की पहचान को भी ले गई। अब आलम यह है कि हर एक घर मे नेता है यही वजह है कि एक एक कर सक्ती अपनी पहचान खोते जा रही है। सबसे पहले सक्ती से दशहरा मेला गायब हुआ फिर गणतंत्र दिवस परेड सक्ती से जेठा चला गया और अब ऐतिहासिक रौताही बाजार भी अपना पुराना नाम खो कर डिज्नीलैंड बन गया।

अगर अब भी राजनीति राजमहल से चलते रहती तो ना कलेक्ट्रेट जेठा जाता और ना सक्ती की पहचान खत्म होती। अगर सब कुछ यूं ही चलते रहा तो वो दिन दूर नही जब सक्ती का नाम भी बदल कर कुछ और रख दिया जाएगा।